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Yaadon Ke Aangan Mein… Available

Yaadon Ke Aangan Mein…

By Dr. Sudha Gupta ‘Amrita’

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311.00
SKU Code Book2302676C
ISBN 9788167452917
Pages 159
Language Hindi
Genre General Fiction
Book Type Paperback
Book Size 5*8
Published Date 27 October, 2026

Synopsis

"मन अंतर आकाश में संवेदना का संगीत रचता है...पीड़ा को अंतरलय में गूंथते हुए आनंद का सृजन करता है.... जिससे अवसाद की महानदी में डूबते हुए भी मन विहँसने लगता है और नेत्र सजल हो उठते हैं.... मन की यही गति गीत रचती है।
अंतः प्रेरणा से उद्भूत भावनाओं का उद्वेलन जो अनायास प्रस्फुटित होता है वह निर्झर की तरह बहता चला जाता है जिसकी लय बद्ध परिणिति गीत होती है।

एक एक सूक्ष्म शब्द भाव पीड़ा की महानदी में गहरे पैठता है और कलम की चप्पू से पार उतरता है... फिर मन साहिल पर खड़ा होकर गुनगुनाता है...."" प्रीत ही मीत है, मीत ही प्रीत है, प्रीत ही गीत है, गीत ही मीत है।""
""गीत और मीत"" समा जाते हैं एक दूसरे में,एक दूसरे के पर्याय बनकर और गीत अधरों पर मुखर होने लगते हैं।
जब तक शब्द भावनाओं की महानदी पार नहीं कर लेते, छटपटाते हैं रात-रात... दिन-दिन।
आत्माभिव्यक्ति, प्रसन्नता,दुख- सुख,प्रवंचना,संयोग-वियोग,गिले- शिकवे, मान मनौअल....गीत सब सहन करते हुए बाहर आते हैं और आनंदित करते हैं।""पीड़ा में भी आनंद"" यही है विरहणी का शाश्वत पाथेय जिसे पाना चाहा है ""यादों के आंगन में....""

इसके पूर्व मेरा एक गीत संग्रह धूप के पंख 2010 में प्रकाशित हुआ था। लंबे अंतराल के बाद इस संग्रह में कोरोना काल में गुप्त जी के जाने के बाद( 29 अप्रैल 2021) गीतों का प्रणयन हुआ जिसके प्रणेता गुप्त जी ही हैं। लोग कहते हैं गीतों में पारंपरिक शैली या पुरानापन है।
विरह गीतों के पुराने पन में ही प्रेम की प्रगाढ़ अनुभूति होती है नए-नए शब्दों में वह प्रगाढ़ता अनुभूत नहीं हो पाती वह तो वैलेंटाइन बन जाता है। मुझे जैसा अनुभव होता है जरूरी नहीं कि सब मेरे विचारों से सहमत हों गीतों की तरह दोहों में भी यह बात अनुभव की जा सकती है सामाजिक,पारिवारिक,
विसंगतियों पर,पर्यावरण पर विज्ञान इत्यादि विषयों पर नई शब्दावली फिट बैठती है इसलिए मेरे इन प्रेम गीतों की शैली परंपरागत ही है। नव गीतकारों को यह बात भले ही खलेगी किंतु मन को खंगालें तो प्रेम का पुरानापन पुराने शब्दों में ही लुभाता है।तत्सम् और आंचलिक शब्दावली से गीत निखरते हैं।
गीत व्यक्तिगत आत्मानुभूति का नि:स्सरण अवश्य है किंतु वह सबको अपना-अपना सा लगता है क्योंकि वह हृदय से प्रस्फुटित भाव होता है जो श्रोता या पाठक के हृदय में सीधे बैठ जाता है। मुझे लगता है इसीलिए पाठकों ने मुझे इन गीतों को पुस्तकाकार करने के लिए प्रेरित किया और गायकों ने इन गीतों को स्वरबद्ध कर गाया है। उनकी प्रतिक्रियाएं इन गीतों पर इसीलिए संग्रह में सादर संलग्न हैं। सभी प्रतिक्रिया देने वाले मेरे अभिन्न मित्रों...सहृदय पाठकों का हृदय से आभार।
"

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