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Samajik Nyay Ka Anathak Rahi
162.00
| SKU Code | Book2302583C |
| ISBN | 9788167452245 |
| Pages | 90 |
| Language | Hindi |
| Genre | Biography |
| Book Type | Paperback |
| Book Size | 5*8 |
| Published Date | 18 September, 2026 |
Synopsis
"एक प्रेरक जीवन, जो अपने समय से सवाल करता रहा
क्या पानी पर अधिकार के बिना स्वाभिमान संभव है?
क्या जमीन से बेदखल इंसान सचमुच स्वतंत्र हो सकता है?
क्या आर्थिक निर्भरता के रहते सामाजिक बराबरी हासिल की जा सकती
है?
और क्या लोकतंत्र सामाजिक न्याय के बिना पूरा हो सकता है?
गणपत लाल मेहरा का जीवन इन सवालों के बीच खड़ा दिखाई देता है।
रामपुरा भाटियान की एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने
चार दशकों से अधिक समय तक पश्चिमी राजस्थान के दलितों,
आदिवासियों, महिलाओं, मजदूरों और घुमंतू वंचित समुदायों के साथ काम
किया।
यह पुस्तक किसी एक व्यक्ति की प्रशस्ति नहीं है। यह उस सामूहिक
संघर्ष की कहानी है जिसमें असंख्य गुमनाम स्त्री-पुरुषों,कार्यकर्ताओं और
ग्रामीण समुदायों ने अपनी हिस्सेदारी निभाई। यह मरुधरा की उस दलित
चेतना का दस्तावेज है जो याचना से अधिकार, चुप्पी से प्रतिरोध और
निर्भरता से स्वाभिमान की ओर बढी।
'सामाजिक न्याय का अनथक राही' गणपत लाल मेहरा के जीवन के
बहाने उस सवाल को सामने रखती है जो आज भी हमारे लोकतंत्र के
सामने खड़ा है- क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं जिसमें किसी मनुष्य
को अपने पानी, अपनी जमीन, अपनी मेहनत और अपने सम्मान के लिए
किसी के सामने झुकना न पड़े ? यही इस जीवन-कथा की सबसे बड़ी
चुनौती भी है और सबसे बड़ी उम्मीद भी।"
क्या पानी पर अधिकार के बिना स्वाभिमान संभव है?
क्या जमीन से बेदखल इंसान सचमुच स्वतंत्र हो सकता है?
क्या आर्थिक निर्भरता के रहते सामाजिक बराबरी हासिल की जा सकती
है?
और क्या लोकतंत्र सामाजिक न्याय के बिना पूरा हो सकता है?
गणपत लाल मेहरा का जीवन इन सवालों के बीच खड़ा दिखाई देता है।
रामपुरा भाटियान की एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने
चार दशकों से अधिक समय तक पश्चिमी राजस्थान के दलितों,
आदिवासियों, महिलाओं, मजदूरों और घुमंतू वंचित समुदायों के साथ काम
किया।
यह पुस्तक किसी एक व्यक्ति की प्रशस्ति नहीं है। यह उस सामूहिक
संघर्ष की कहानी है जिसमें असंख्य गुमनाम स्त्री-पुरुषों,कार्यकर्ताओं और
ग्रामीण समुदायों ने अपनी हिस्सेदारी निभाई। यह मरुधरा की उस दलित
चेतना का दस्तावेज है जो याचना से अधिकार, चुप्पी से प्रतिरोध और
निर्भरता से स्वाभिमान की ओर बढी।
'सामाजिक न्याय का अनथक राही' गणपत लाल मेहरा के जीवन के
बहाने उस सवाल को सामने रखती है जो आज भी हमारे लोकतंत्र के
सामने खड़ा है- क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं जिसमें किसी मनुष्य
को अपने पानी, अपनी जमीन, अपनी मेहनत और अपने सम्मान के लिए
किसी के सामने झुकना न पड़े ? यही इस जीवन-कथा की सबसे बड़ी
चुनौती भी है और सबसे बड़ी उम्मीद भी।"
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